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UPSCian

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Result of UPSC/IAS PRE has released two/three days ago. In fact, now the phase of purchasing NCERT books will have started once again in the country. Self/Confidence will start boiling in the aspirants/MAINS attempters😄. Many boys and girls would have turned/travelled to Mukherjee Nagar, Jaipur and Patna. In the context of civil services, the one with an unkempt/non-systemetic beard will be considered the most senior🤪.  By the way, these people have so much knowledge that they become chalta-firta Google. Well, there is one thing, those who want to remove peace from their life should go to Mukherjee Nagar and prepare for UPSC.  #By the soul of ExAspirant🙂. #कुलदीप शर्मा 

नया वर्ष आया।

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शेर पानी पी रहा था, उसके मुँह में बाल आ गया.. पीछे मुड़ के देखा तो नया साल आ गया..!!  क्या थे वो ग्रीटिंग ड्राइंग की शीट के, क्या थे बचपन के दिन, जब से होश सम्भाला है, सब खो गया है। हाय रे पापी होश, मस्ती ले ली सबकी।    समझ नहीं आता क्या बदला है, रोज़ की तरह वो ही सूर्य दिखा है, वो ही रोशनी पैर पसार रही है आँगन-छत पर। वो ही रोशनी नहा रही बाल्टी के पानी में। वही ओस से लदे पेड़-पौधे गुम-सुम शांत हैं। वो ही अख़बार वाला, फ़ेरी वाला। सब तो वही है, नया फिर है क्या? केवल साल नया है? वो ही रोज़ की तरह मोटरसाइकिल लदी है(फोटो चस्पा है) नमकीन, बिस्किट, मट्ठी-मटर से। जैसे पहले के जमाने में यातयात के साधनों की कमी से सवारियाँ लद कर अपने गन्तव्य तक जाती थी, लेकिन वो नमकीन बिस्किट्स नहीं हैं, वो जिम्मेवारियाँ हैं, जिन्हें बेच कर उस मोटरसाइकिल चालक का घर चलता है। कहने को मोटरसाइकिल है लेकिन चलते समय लेती है कार जितनी जगह।   स्थिति देख फ़ैज़ लुधयानवी का शेर याद आ रहा है- "तू नया है तो दिखा सुबह नयी, शाम नयी...  वरना इन आँखों ने देखे है नये साल कई।" इस पर अपना भी एक शेर तैयार है-...

घरेतन की यादो का सिलसिला

“आपका अरमा आपका नाम, मेरा तराना और नही , इन झुकती पलकों के सिवा दिल का ठिकाना और नही” टाइप गाने सुनकर होने वाली घरेतन को याद कर रहे थे। कई दिन से मुँह फुलाए थी जैसे गैस निवारक चूर्ण की ऐड में पेट फूला दिखाते है। ना तो रिप्लाई आ रहे थे ना कोई  चलभाष पर बात हो पा रही थी। वैसे ये सब ज़्यादा सोचने का नतीजा होता है। खेर जो भी है सब ठीक हो जाएगा। मतलब फ़िज़ाएँ फिर से रंगीन हो जाएँगी। फ़िलहाल महाराजपुर एयरफ़ोर्स स्टेशन के राजमाता विजय राजे सिकंडे एयरपोर्ट पर बैठा हूँ, ग्वालियर शहर से क़रीबन ५-७ किलोमीटर की दूरी पर स्तिथ है। यहाँ से उड़कर दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पर उतरेंगे। वहाँ से भारतीय रेलवे द्वारा किसी भी लोकल में सवार होकर सोनीपत उतरेंगे। गतिमान ही रहेंगे कई घण्टे। यहाँ ग्वालियर हवाईअड्डे पर कुछ असिस्टेंट, एयरहोस्टेस आदि कर्मचारी अपनी वेशभूषा में अपने अपने कार्य में लगे है। वेशभूषा ही तो आपको एकीकृत करती है एक एकता का परिचय देती है कि वो उस कम्पनी के कर्मचारी है, वो उसके। जैसे आज “आरे जंगल” और “आरे कॉलोनी” जोकि मुंबई में है वहाँ के लोगों ने २६०० पेड़ों को काट...

ग्वालियर में रोशनी चाची

“ये चाँद सा रौशन चेहरा,ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा” मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में सुनते हुए लेटे थे अपने बिस्तर पर।कमरे में ठीक सामने रौशनी चाची सफ़ेद सीयफल के माध्यम से अपना असर आँखो पर जमा रही थी और दीवार पर पूरी तरह से पसर कर लेटी थी, जैसे की दीवार पर किसी मक्खी-मच्छर या किसी कैलेंडर-कील का कोई हक़ नही हो। ऐसा लग रहा था कमरे में हम, रौशनी चाची और कमरा ही हो बस। दीवार भी पूरी चमक के साथ ख़ुशनुमा नज़र आ रही थी, एक जगह तो चाची को कपड़ों ने अपने पास ही रोक लिया था और दीवार की चमक छिन ही ली थी ,मानो जैसे बच्चे की पहुँच से कोई चीज़ दूर कर दी जाती है। इसके चलते छत का पंखा भी पूरे ताव में था, दोनो का असर तो बिजली से ही था, नही तो कहाँ का असर होता और कहाँ का ताव। वैसे देखा जाए तो बिना बिजली के आजकल बहुत से काम मुश्किल हो गये है सफल लेखक बनने की तरह। खेर जो भी है आँखो पर पड़ने वाली रोशनी चाची को एक पाँव के पंजे से अवरुध कर दिया जोकि दूसरे पाँव के बलबूते खड़ा होकर अपना हुनर दिखा रहा था।  काफ़ी देर से ऐसे ही गीत सुन रहे थे कि याद आया आज ब्लॉगर पर कुछ बोणी-बट्टा करना है तो हो गये शुरू।  बै...